सास-ससुर और कैरियर

सर्वप्रथम, मैं अपने सभी पाठकों को धन्यवाद कहना चाहूंगी जिन्होंने मेरा पिछला हिंदी लेखन –“ससुराल क्या है ?” बहुत सराहा और ’१४ हज़ार’ से ज्यादा लोगो ने उसे फेसबुक पर ‘लाइक’ किया l शुक्रिया आप सभी का l हालहीं में मैं एक परिवार से मिली, जिसकी गाथा सुनते हीं मैंने ठान लिया कि, मैं इस कहानी को लोगों तक पहुँचlऊँगी l तो चलिए, पढ़ते है आधुनिक ज़माने के एक परिवार के बारें में l

ये लघु कहानी सुधा और उसके ससुराल पर आधारित है l  सुधा, बिहार के एक छोटे से गाँव में बी. कॉम की पढाई कर रही थी l सुधा के घर के आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी l उसके घर वाले उसकी शादी जल्दी करना चाहते थे l वो हर काम में निपूर्ण, सुन्दर, सुशील और संस्कारी लड़की थी l उसे शहर की हवा नहीं लगी थी l वो बहुत ही साधारण लड़की थी l आज भी लड़के वाले ऐसी ही लड़की से शादी करना पसंद करते है l

उसके रिश्तेदार ने उसकी शादी के लिए एक रिश्ता बताया l लड़के वाले दिल्ली में रहते थे l लड़का मुंबई में सी. ए. (चार्टेड अकाउंटेंट ) के पद पर था l सुधा के मम्मी-पापा को थोड़ी शंका हुई की-इतना अच्छा लड़का मेरी लड़की से शादी कैसे करेगा ? वो लोग तो बहुत अमीर होंगे और दहेज़ भी बहुत मांगेंगे l लड़के वालो से बात करने के बाद पता चला की उनका बेटा-विवेक मांगलिक है और उन्हें मांगलिक बहु ही घर लाना है l बहुत लड़की देखने के बाद उन्हें सुधा मिली जो मांगलिक भी थी और कुंडली भी मिल गयी l आज भी लोग कुंडली पर आँख बंद करके विश्वास करते है l दोनों की उम्र में भी लगभग ६ साल का अंतर था l विवेक ने तो अपने माँ-बाप की बात मान ली और सुधा से शादी करने को तैयार हो गया l लेकिन सुधा अपनी पढाई पूरी करनी चाहती थी l उसकी किसी ने एक भी न सुनी और दोनों की शादी बिना दहेज़ , बिना किसी मांग के धूम-धाम से हो गयी l

शादी के एक हफ्ते बाद, सुधा को विवेक के साथ मुंबई जाना था l उसे अकेले जाने में संकोच हो रहा था l उसने अपनी सासू-माँ से बोला – “माँ, मै आप लोगो के साथ रहना चाहती हूँ l मै अकेले किसी लड़के के साथ कैसे रहूंगी”? उसकी सासू-माँ ने उसका सिर सहलाते हुए प्यार से समझाया – “बेटा, अब तुम्हारी शादी हो गयी है l विवेक तुम्हारा पति है l साथ में रहने से ही तुम दोनों एक-दुसरे को अच्छे से जान सकोगे l कोई भी परेशानी हो मुझे जरूर याद करना l मै हमेशा तुम्हारे साथ हूँ बेटा” l ये सुनते ही सुधा की आँखें नम हो गयी और उसे अपनी माँ के रूप में सासू-माँ मिल गयी l सुधा उनसे गले लिपटकर रोने लगी l जाने का दिन करीब आया, सुधा और विवेक मुंबई के लिए रवाना हो गए l

दोनों एक दुसरे को समझने की कोशिश कर ही रहे थे की, एक दिन विवेक का सहकर्मी ने दोनों को अपने बेटे के जन्मदिन की पार्टी में बुलाया l सुधा के लिए ये सब बिल्कुल नया था l नया शहर, मॉडर्न  लोग l लड़कियों और महिलाओं को छोटे स्कर्ट, एक पीस में देख के वो झिझकने लगी l सब को अंग्रेजी बोलते देख वो एकदम घबरा गयी l किसी ने उससे अंग्रेजी में उसके बारें में पूंछ लिया l संकोच में कुछ बोल नहीं पाई l विवेक को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा l उसे बेईज्ज़ती महसूस हुई l विवेक उसे पार्टी के बीच में ही घर छोड़ आया l बेचारी सुधा को बहुत बुरा लगा l रोते-रोते उसकी रात कटी l

ऐसा एक-दो बार और हुआ l विवेक से रहा नहीं गया और वो उसे दिल्ली छोड़ आया l विवेक के माता-पिता ने उसे बहुत समझाया साथ रहने को , लेकिन वो माना नहीं l सुधा अपने सास-ससुर के साथ रहने लगी l विवेक उससे फोन पर भी कभी-कभी ही बात करता था l सुधा उन लोगों के साथ ज्यादा खुश रहने लगी l  उसके ससुर (जो खुद एक रिटायर्ड अंग्रेजी प्रोफेसर थे) ने उसे अंग्रेजी पढ़ना शुरू किया l वो हर चीज़ जल्दी सीख जाती थी l पढाई में उसकी लग्न देख के उसके ससुर ने उसे फिर से बी.कॉम करवाया l हर परीक्षा में वो अव्वल आती थी l विवेक को सुधा के बारे में किसी ने नही बताया l और न ही वो कभी कुछ पूछता था l धीरे-धीरे सुधा ने भी उससे बातें करना बंद कर दिया l वो अपनी पढाई में व्यस्त हो गयी l उसे वही प्यार और दुलार मिला जो एक लड़की को अपने मायके में मिलता है l सास-ससुर ने उसका बहुत ख्याल रखा l

दिन गुजरा,और वो दिन भी आ गया जब सुधा की नौकरी लग गयी l वो बेजिझक अंग्रेजी बोलने लगी l हैरानी वाली बात तो ये है की उसकी नौकरी उसी कंपनी में लगी जहाँ उसका पति काम करता था l ये खुशखबरी भी किसी ने विवेक को नहीं दी l सुधा के ससुर ने मुंबई में एक होटल बूक किया l सुधा के जोइनिंग के एक दिन पहले , वो अपनी बहु और बीवी को लेकर मुंबई निकल पड़े l

पहले दिन जब सुधा ऑफिस गयी , सभी नए कर्मचारियों को एक रूम में बैठाया गया l सुधा सबसे आगे बैठी थी l कुछ देर बाद , कम्पनी का परिचय देने एक व्यक्ति आया l सुधा को देखते ही उसकी आँखें भर आई l उसने  सुधा को बाहर आने को कहा l जैसे ही सुधा बहार आई , उसके गले लग के रोने लगा l सुधा ने सारे गिले शिकवे भूल के उसके आसूं पोछें और मुस्कुराते हुए बोली –

“नाउ वी विल बी वर्किंग ठुगेथेर, माई हस्बैंड” (अब हम दोनों साथ काम करेंगे, मेरे पतिदेव )

विवेक को अपनी गलती का एहसास हुआ l उसने सुधा से कई बार माफ़ी मांगी l सुधा उसे ऑफिस के रिसेप्शन रूम में ले गयी, जहाँ  उसके सास-ससुर बैठे थे l उन्हें देख के विवेक फिर एक बार हैरान हो गया l उसे अपने किये पे अफ़सोस तो हुआ लेकिन अपने माता-पिता पे बहुत गर्व भी हुआ, जिसने अपनी बहु के भविष्य के बारें में सोचा l और उसे अपना कैरियर बनाने में पूरा सहयोग किया l

मेरे बहुत से पाठकों को ये कहानी काल्पनिक लगेगी l और ये स्वाभाविक भी है क्यूंकि आजकल ऐसा परिवार बहुत-बहुत कम मिलता है l आप लोगो तक ये कहानी पहुँचाने का मेरा बस एक मकसद है – “आने वाले समय में हर घर में विवेक के पापा-मम्मी जैसा कोई इंसान होना चाहिए l इसके लिए खुद में बदलाव पहले जरूरी है”l

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